अपनी खुशी सर्वोपरि, दूसरे की तकलीफ से हमें क्या…

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ललित वर्मा
कुछ महीने से आदत हो गई है, नींद खुलते ही छज्जे पर आने की। यहां से नीचे झुक कर गमलों के नए आए फूल देखता हूं। आज कितने नए खिले। अच्छा लगता है। इनमें एक बेल है जो शुरू के छह महीने तो बढ़ी ही नहीं। जब भी कोंपलें फूटतीं, या तो गली से निकलने वाली बकरियों के झुंड में से कोई बकरी चबा डालती, या कभी गर्मी से कोंपल जल जाती। एक सुबह देखा कि एक कुत्ते ने उस बेल को चबाकर तोड़ दिया और चलता बना। मैं हैरान कि सारा दिन हमारी दहलीज पर आराम से सोने वाले इस कुत्ते से तो ये उम्मीद नहीं थी। खैर, जुलाई में बरसातें शुरू हुईं। मैंने इसके चारों तरफ कांटे की एक झाड़ बांध दी। उसके बाद ये तेजी से बढ़ी और अब एक छत क्रॉस करके दूसरी छत की तरफ जा रही है। सुबह-सुबह इसकी प्रोग्रेस नोट करने में बड़ा मजा आता है। दो इंच भी बढ़ती है तो लगता है कुछ अचीव हो रहा है।

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आज सुबह 5 बज रहे थे। रात का अंधेरा सुबह के उजाले में मिक्स होकर खत्म होने ही वाला था। मैं छज्जे की ग्रिल से कोहनी टिकाए नए फूलों की प्रोग्रेस नोट कर रहा था। तभी एक महिला आई और गमलों को देखने लगी। उसने मुझे नहीं देखा। मैं उसे देख रहा था। वह रुकी। गमलों की तरफ बढ़ी और लाल गुडहल की एक कली तोड़ ली। वह कली आज फूल बनने वाली थी। मुझे तकलीफ सी हुई, पर मैं चुप रह गया। फिर उसने दूसरे गमले से सफेद गुडहल की एक कली तोड़ ली। वह भी आज खिलकर फूल बन जाती। मैं चुप रहा और सोचने लगा कि वह ऐसा क्यों कर रही है। वह आगे बढ़ी और खाली प्लॉट में उगे एक जंगली पौधे से एक फूल तोड़ लिया। तब मैंने अंदाजा लगाया कि शायद वह पूजा के लिए फूल इकट्ठे कर रही है। कलियां भी किसी पूजा में इस्तेमाल होती होंगी। कलियां चढ़ाने से भी भगवान खुश होते होंगे। और भगवान खुश होंगे तो महिला को खुशी मिलेगी। मेरी वाइफ को भी मैंने मंदिर में गुडहल चढ़ाते देखा था। मैंने उनको बताया, पर वह कुछ खास खुश नहीं दिखीं।

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कितनी विडंबना है न। हम अपनी खुशी के लिए एक बार भी नहीं सोचते कि इससे किसी दूसरे की खुशी तो नहीं छिन रही। हमें अपनी खुशी देखनी है। हम डॉग लवर हैं, हमें आक्रामक ब्रीड वाले कुत्ते पालने में खुशी मिलती है, हम पालेंगे। उसे गली में घुमाएंगे। दूसरे डरते हैं, असहज होते हैं तो हों, हमारी प्रॉब्लम थोड़े न है। बार-त्योहार गधे जैसी आवाज वाले भोंपू खरीदकर जोर-जोर से बजाते हुए चलेंगे। यही सेलिब्रेशन है। मेट्रो में सीट पाने की खुशी पाने के लिए दरवाजा खुलते ही किसी को धकियाना पड़े, धकिया देंगे। सीट मिलने की खुशी के आगे ये सब छोटी-मोटी चीजें क्या हैं। अपनी खुशी से बढ़कर क्या है?

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं



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