एलिजाबेथ एक अपवाद जो नहीं थीं शासक

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बीते कुछ दिनों में पूर्व उपनिवेशों और उनके शासकों के पुराने असहज संबंध उजागर हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट की विशालकाय छतरी के नीचे नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा का शुक्रवार को उद्घाटन किया। भारत की आजादी से पहले इस विशालकाय छतरी में क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के बाबा जार्ज पंचम की प्रतिमा लगी थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जार्ज पंचम की मूर्ति को हटा दिया गया था।

अब राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ रखा गया है। मोदी ने अपने संबोधन में याद दिलाया कि राजपथ अंग्रेजों की दासता का प्रतीक है और भारत दासता के इन प्रतीकों को छोड़ रहा है।  वर्तमान सरकार की नीति और उपनिवेशवाद के प्रतीकों को छोड़ने के बीच संबंध भी निकाले गए हैं। जैसे अंग्रेजों के प्रभाव को कम करने के प्रयास के तौर पर नई शिक्षा नीति की तारीफ की गई। (हालांकि उपनिवेश के प्रतीकों को छोड़ने के संदर्भ में विजय गीत का उल्लेख नहीं हुआ। हमारे राष्ट्र में औपनिवेशिक दौर के सबसे खराब व दुखद वाक स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़े राजद्रोह व उससे जुड़े कानून अभी भी किताबों में दर्ज हैं।)

प्रधानमंत्री को अपना भाषण खत्म करने के कुछ ही मिनट बाद महारानी एलिजाबेथ के देहांत के कारण भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर प्रकाश डालना पड़ा। प्रधानमंत्री ने महारानी एलिजाबेथ से हुई मुलाकात का जिक्र किया और भारत-ब्रिटेन के करीब संबंधों पर प्रकाश डाला। यूनाइटेड किंगडम में इस सप्ताह ब्रिटेन और राष्ट्रमंडल देशों के स्थायी संबंध अधिक उजागर हुए, जब पहली बार राज्य में उच्च पदों पर किसी श्वेत पुरुष की नियुक्ति नहीं हुई। 

ब्रिटेन के वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री पद पर प्रवासियों के वंशज नियुक्त हुए हैं। इनमें घानावासियों के पुत्र क्वासी क्वार्टेंग और पूर्वी अफ्रीका से भारतीय मूल के प्रवासियों की संतान सुएला ब्रेवरमैन हैं। इसी तरह जेम्स क्लेवर्ली की मां सिएरा लियोन से थीं। क्वार्टेंग से पहले के तीन चांसलर भी प्रवासी रहे हैं। इनमें  नादिम जहावी का जन्म बगदाद में हुआ और उनके माता-पिता कुर्द हैं। ऋषि सुनक के माता-पिता पूर्वी अफ्रीका से हैं, लेकिन भारतीय मूल के हैं। साजिद जाविद के परिवार के कुछ सदस्य अभी भी पाकिस्तानी पंजाब के टोबा टेक सिंह शहर में रहते हैं।

एलिजाबेथ द्वितीय ने विश्व युद्धों के दौर और युद्ध के बाद की स्थिति को देखा था और वह एक तरह से उस दौर की अंतिम जीवित कड़ी थीं। उन्होंने अपने दीर्घायुकाल में छोटे से द्वीप की आधी दुनिया पर राज करने वाले साम्राज्य को सिकुड़ते हुए देखा। इस दौर में यूरोपियन ब्लॉक मजबूत होने के कारण ब्रिटेन अपनी आवाज पुराने बुलंद तरीके से नहीं उठा पा रहा था। लेकिन फिर भी ब्रिटिश राजशाही ने अपना प्रभाव बरकरार रखा। ब्रिटिश राजशाही ने अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मामलों में अपने साम्राज्य की विरासत को कायम रखा व पूंजी, कारोबार और लोगों के मामले में तुलनात्मक रूप से खुलेपन की नीति रखी। इसलिए इन अनगिनत विशेषताओं को हम ‘सॉफ्ट पावर’ कहते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी अशोक मलिक ने महारानी के बारे में ट्वीट किया,’ महारानी ने राजशाही के प्रतीक और व्यक्ति रूप से ब्रिटेन के वैश्विक रुतबे से कहीं अधिक दायित्वों को अंजाम दिया… इससे पहले कि हम सॉफ्ट पावर को समझ पाते, उन्होंने बहुत सलीके से इस ताकत का इस्तेमाल किया।’

दिवंगत महारानी ब्रिटिश राजशाही के पूर्व शासकों से  बिल्कुल अलग थीं। महारानी ने न केवल लंबे समय तक राज किया बल्कि उन्होंने कई विवादों व हस्तक्षेप से अपने को दूर रखा। हालांकि उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। विक्टोरिया ने 63 साल राज किया और एलिजाबेथ द्वितीय ने 70 साल राज किया। इन दोनों की तुलना करना फायदेमंद है। महारानी ने 19वीं सदी में अपने पति की मौत के बाद अपने को सार्वजनिक कार्यों से अलग कर लिया और एकांत को पसंद किया। राजशाही के पूर्व शासकों जार्ज चतुर्थ और एडवर्ड अष्टम के दौर में संवैधानिक संकट पैदा हुए थे। महारानी के वंशजों में 18वीं सदी में उनके पिता जार्ज षष्टम के अलावा अन्य ने अपने दायित्वों को बखूबी अंजाम नहीं दिया। यह दुखद है कि राजशाही के साथ ऐसी घटनाएं नियमित तौर पर होती रहीं। 

यह सही है कि राष्ट्रपिता प्रणाली की तुलना में संवैधानिक राजशाही के कुछ फायदे हैं। राष्ट्रपति प्रणाली की बात करें तो अमेरिका, फ्रांस और फिलिपींस यह दावा कर सकते हैं कि देश में निर्वाचित राष्ट्रपति भी राजशाही की तरह है – लेकिन उस पर ऐतिहासिक रूप से राजशाही पर लगी बंदिशें नहीं  होंगी (आमतौर पर राजनीतिक रुझान के अनुरूप लगाते हैं)। इससे पक्षपात होने की आशंका बढ़ जाती है और निरंकुशता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। हमारे देश में इंदिरा गांधी के दौर में कुछ लोगों ने राष्ट्रपति प्रणाली की आवाज उठी थी लेकिन उसे नजरंदाज कर दिया गया।

राजा चार्ल्स तृतीय को उन दायित्वों को अंजाम देना होगा जिसका कोई विरोध नहीं करेगा। वह बतौर राजा अपने दायित्वों की शुरुआत 73 साल की उम्र में करेंगे? उनका रुतबा अपनी मां की तरह नहीं है। हालांकि उन्होंने कई बार मंत्रियों को विधायिका के मामले पर पत्र लिखे जिनमें वैकल्पिक दवाई, ऑर्गेनिक खेती और आधुनिक वास्तुकला के मुद्दे उठाए गए। यह बहुत संभव है कि यदि विशेष प्रतिभावाली महिला ने अपने कार्यों को 70 साल तक बखूबी अंजाम नहीं दिया होता तो ब्रिटिश राजतंत्र लंबे समय से सुधार नहीं होने के बावजूद कायम रह पाता।

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