नि:शु​ल्क उपहारों पर सार्थक बहस जरूरी


मुफ्त उपहार गंभीर राजनीतिक चुनौतियां पेश करते हैं लेकिन उनसे निपटने के लिए आ​र्थिक नीति संबंधी प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य 

आ​र्थिक नीति संबंधी बहस लोकतंत्र के कामकाज का हिस्सा है। ऐसी बहसों में यह गुंजाइश होती है कि किसी प्रस्तावित नीति पर खुले और स्वस्थ वातावरण में मतांतर के साथ बातचीत की जा सके। यहां तक कि कुछ मतभेद अनसुलझे रह जाने पर भी इन बहसों के पश्चात लिए गए निर्णय को उन लोगों द्वारा भी स्वीकारे जाने की काफी संभावना होती है जो अन्यथा शायद उसके विरोध में हों। यही बात एक सक्रिय लोकतंत्र को अ​धिक भागीदारी वाला और प्रभावी बनाती है।

भारतीय समाज एक तर्कशील समाज है और यहां आ​र्थिक नीति को लेकर तमाम बहस होती रहती हैं। योजना आयोग की स्थापना का विचार नेहरू सरकार में हुई एक जीवंत बहस के बाद आया था। उनके वित्त मंत्री ऐसी किसी संस्था के गठन को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं थे और उन्होंने सरकार तक छोड़ दी थी। परंतु सरकार के भीतर एक बहस हुई। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू अपने विचारों पर टिके रहे और योजना आयोग की स्थापना हो गई। 

यहां तक कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के पहले भी इंदिरा गांधी की सरकार में गहन विचार-विमर्श हुआ। कुछ प्रतिरोध के पश्चात उनके वित्त मंत्री ने बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण के रूप में बीच का रास्ता अपनाया। परंतु अंतत: इंदिरा गांधी ने पाया कि ऐसा करने से लक्ष्यों की प्रा​प्ति नहीं हो पा रही है और उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस दौरान उन्होंने न केवल अपने वित्त मंत्री से निजात पाई बल्कि कई सहयोगियों को भी अंधेरे में रखा।

यह याद र​खिए कि ऐसे हर आ​र्थिक नीति संबंधी निर्णय के पीछे गहन राजनीतिक विचार थे। सरकार के भीतर भी इन्हें लेकर बहस हुई और तमाम मतभेद भी सामने आए लेकिन राजनीतिक कारण इतने मजबूत थे कि तत्कालीन नेताओं ने अपने विचारों को क्रिया​न्वित करने का निर्णय लिया, भले ही उन्हें इसकी कुछ कीमत चुकानी पड़ी।

बीते कुछ वर्षों में आ​र्थिक नीति से जुड़ी बहस कम हो गई है। मोदी सरकार द्वारा नवंबर 2016 में नोटबंदी जैसा उथलपुथल मचा देने वाला आ​र्थिक निर्णय लेने के पहले शायद ही कोई बहस हुई। इसके विपरीत वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता यानी आईबीसी को पेश करने के पहले व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

इनमें भी दिक्कतें और कमियां थीं लेकिन कोई यह नहीं कह सकता था कि जीएसटी और आईबीसी को लागू करने के पहले किसी तरह की चर्चा नहीं हुई। नए कृ​षि कानूनों को लेकर कुछ चर्चा की गई थी लेकिन कोविड के दिनों में हड़बड़ी में विधेयक संसद में पेश किए गए। उन्हें लेकर गहन राजनीतिक विरोध हुआ और सरकार को कानून वापस लेने पड़े। कुछ वर्ष पहले ठीक इसी तरह भूमि अ​धिग्रहण कानून को भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था।

ऐसे में कुछ सप्ताह पहले एक स्वागतयोग्य बात तब हुई जब मोदी सरकार ने मुफ्त उपहारों पर बहस छेड़ दी। यह एक अहम नीतिगत मसला है। क्या सरकारों को लोगों को नि:शुल्क वस्तु या सेवा की पेशकश करनी चाहिए? क्या सार्वजनिक बेहतरी के लिए बनी वास्तविक कल्याण योजनाओं को जारी रहने देना चाहिए और केवल निजी वस्तुओं को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को सीमि​त किया जाना चाहिए? उदाहरण के लिए क्या मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना जिसके तहत गरीबों को घरेलू गैस कनेक्शन दिए जाते हैं उसे मुफ्त उपहार या रेवड़ी माना जाना चाहिए? यह कहा जा सकता है कि उज्ज्वला योजना सार्वजनिक बेहतरी में मददगार है। इसलिए इसे रेवड़ी नहीं माना जाना चाहिए।इस बहस में दो अन्य मानकों का उल्लेख किया गया जिनके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कोई योजना मुफ्त उपहार योजना है अथवा नहीं। पहली बात, कोई भी योजना जो सबके लिए ​शिक्षा या स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण को बढ़ावा देती हो, उसे नि:शुल्क उपहार योजना नहीं माना जाना चाहिए, भले ही उसे नि:शुल्क या नाम मात्र की धनरा​शि लेकर उपलब्ध कराया जा रहा हो। दूसरा, कोई भी योजना जो पूरी तरह बजट द्वारा पारदर्शी ढंग से प्रायोजित हो और राज्य को राजकोषीय दृ​ष्टि से गैरजवाबदेह न बनाती हो उसे मुफ्त बताकर उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए। 

दोनों मानक अत्य​धिक प्रासंगिक और आपस में संबद्ध हैं। राज्य को अपने नागरिकों को​ ​शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करानी ही चाहिए। ऐसी सेवाओं को स​ब्सिडी की जरूरत है ताकि गरीब से गरीब आदमी तक ये आसानी से पहुंच सकें। परंतु यह सुनि​श्चित करना भी उतना ही अहम है कि इन स​ब्सिडी से राजकोषीय विवेक के सिद्धांतों को क्षति न पहुंचे।

हाल में कुछ राज्यों ने अपने बजट में इन सेवाओं की लागत को लेकर पारद​र्शिता नहीं बरती है। इससे उनकी बजट से इतर जवाबदेही बढ़ी है। यह अच्छी प्रवृ​त्ति नहीं है। बीते कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बजट से इतर देनदारी कम करने में उल्लेखनीय काम किया है और वह उन्हें भारतीय संचित नि​धि के तहत ले आई है। 

दुर्भाग्य की बात है कि नि:शुल्क उपहारों की बहस राजनीति में चली गई जबकि यह काफी अहमियत रखती है। इस बहस का संदर्भ जिस तरह तय किया गया है उससे पता चलता है कि कैसे तमाम राजनीतिक दल इस अहम मसले का इस्तेमाल एक दूसरे के ​खिलाफ राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने में कर रहे हैं। कई राज्यों के आगामी चुनावों में केंद्र का सत्ताधारी दल भी नि:शुल्क उपहारों को अहम चुनावी मसला मान रहा है। राज्यों को नि:शुल्क उपहार वितरित न करने देने का निर्णय सत्ताधारी दल की इस को​शिश का हिस्सा है कि विपक्षी दलों को नि:शुल्क उपहार आधारित राजनीतिक अ​भियान न चलाने दिए जाएं।

कई राज्यों की गलती यह है कि वे चुनाव के पहले किए गए वादे पूरे करने के लिए नि:शुल्क उपहारों की बौछार कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि नि:शुल्क उपहार एक गंभीर आ​र्थिक नीति संबंधी चुनौती सामने रखते हैं। इस चुनौती का सामना करने के लिए यह आवश्यक है कि इसे चुनावी लड़ाई का विषय नहीं बनने दिया जाए। इसके लिए यह आवश्यक है कि बहस-मुबाहिसा करके, केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय के साथ मानक तय किए जाएं ताकि ऐसे नि:शुल्क उपहारों की परंपरा समाप्त हो जो राजकोषीय ​स्थिति को प्रभावित करते हैं।

इस वर्ष केंद्र और राज्यों का समेकित राजकोषीय घाटा दो अंकों में रहेगा। ऐसा लगातार तीसरे वर्ष होगा। इससे भी बुरी बात यह है कि चालू खाते का घाटा भी इस वर्ष सकल घरेलू उत्पाद के 4 फीसदी का खतरनाक स्तर छू सकता है। दोहरे घाटे की आाशंका के बीच नि:शुल्क उपहारों के राजकोषीय प्रभाव से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्यों के बीच एक विवेकपूर्ण बहस हो। राजनीतिक हिसाब-किताब निपटाने से बात नहीं बनेगी और देश एक और आर्थिक संकट की ओर बढ़ जाएगा। 



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